Dilon ko jeetne ka shauk

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Sunday, October 6, 2013

आवाज


सोलह दरिया पार की तब तेरा शहर मिला,
तूमने सुनी थी जो सदा मैं वही आवाज़ हूं,

आग में सुरुर है और मेरा दर्द भी मजबूर,
जल रही हूं शौक से मैं हिज्र की मेहताब हूं।

2 comments:

shrishti bhatnagar said...

beautiful lines :-))

Raj said...

Dear Shrishti Bhatnagar,
Thanks for your sweet comments :)