
यह सावन भी दिल की तपती ज़मीन,
को 'प्यार' की फुहार ना दे सका,
बरसों से इस रेगिस्तान की ज़मीन,
पर थोड़ी प्रेम की ठंडक भी ना दे सका,
अँखियाँ अब भी ना थकी उसकी आस में,
राहत की जो एक झलक भी ना दे सका,
यह कैसी हरियाली है सावन की हर तरफ,
हमें एक बूँद ओस की भी ना दे सका.!