यही वह धनतेरस थी स्थान था स्काटलैंड (यूं के) 30-10-2005
जो कहा करते थे की कभी हम बेईमान नही होंगे,
उन्ही के ईमान को देखा आज हमने डगमगाते हुए,
जिन हाथों से उम्मीद थी फूल बरसाने की,
उन्ही हाथों को देखा आज पत्थर बरसाते हुए,
जिस वक़त पर नाज़ हुआ करता था कभी मुझे,
उसी वक़त को देखा रेत सा हाथों से निकल जाते हुए,
जिसने कहा था कि ये साथ नही छूटेगा अपना कभी,
उसी को देखा आज अपना दामन मुझसे छुडाते हुए,
{प्यार} की इन वफाओं का क्या सिला चुका पाओगी तुम,
जिसे देखा बेवफा बन के उस "खुदा" के घर जाते हुए........"प्रियराज"
7 comments:
दिपावली की शूभकामनाऎं!!
शूभ दिपावली!!
- कुन्नू सिंह
bahut dard hai kavita mai...
Pehlee baar aapke blogpe aayee hun...kiseeke blogpe aapka link leke, jahan aapne badehee sundar dhangse kavyatmak tippanee dee hai...jan na chah rahee thee ki wo rachna aapheeki hai...? Par aapke blogpe aake koyi shanka nahee rahee..
Sabse pehle to itnee sundar, mohak tasveerne apnee or aakarshit kiya aur phir aapki rachnayon ne !
Kya kahun ? Wahee ghise pite alfaaz? Us se to maun rehke anand utha rahee hun..jaise bezuban ban gayee hun !
अच्छा लिखते हैं राज जी, और कोशिश करें अभी और मेहनत की जरुरत है...बधाई
ye word verification hta den
raj bhai
bahut ache sher likhe hain
mere dilki mano baat ho.
badhai
वाह! जारी रहें.
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जिस वक़त पर नाज़ हुआ करता था कभी मुझे,
उसी वक़त को देखा रेत सा हाथों से निकल जाते हुए,
bahut hi achhi rachna
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